अररिया : फूल बने हैं राह के काटे,ये सब मेरी मां की दुआ है..। फूलों पर यह अवामी शायर हारुण रसीद गाफिल की नजर है। इन पर आम नजरें जाती तो जरूर हैं, लेकिन भौतिकता की तलाश में भटक रही आंखें शायद इन्हें नहीं देख पाती।
हिमालय तराई की गोद में बसे अररिया जिले को कुदरत ने दोनों हाथों से दिया है। कुदरत की नियामत के रूप में यहां के खूबसूरत फूल जंगलों में खिलते हैं, अपनी महक बिखेरते हैं और फिर वहीं की मिट्टी में मिल जाते हैं। लेकिन रोग, पीड़ा व स्वास्थ्य संबंधी मजबूरियों से त्रस्त ग्रामीण आबादी का एक बड़ा हिस्सा इन फूलों व वनस्पतियों का आम जन जीवन में खुशियों के फूल खिलाने के लिए भरपूर इस्तेमाल करता है।
एक अध्ययन के अनुसार अररिया जिले में वाइल्ड फूलों की तकरीबन दो सौ प्रजातियां हैं। इन सबका अलग-अलग इस्तेमाल होता है। अमलतास (कैसिया फिस्टुला) के पीले फूल और बाद में लगने वाले लंबे फल पेट संबंधी कब्ज व अन्य गड़बडि़यों की अचूक औषधि हैं। इसी तरह जिले के ग्रामीण कटैया के फूल व बीजों का प्रयोग चर्मरोग से छुटकारा पाने के लिए करते हैं। पेड़ पर लगने वाले गजरेनुमा फूलों व वनस्पति का प्रयोग कान की जड़ में होने वाले घाव से निजात पाने के लिए किया जाता है।
यहां के जंगलों में भरपूर सुगंध वाले कई फूल हैं, जो जंगल में ही अपनी सुगंध बिखेर कर मिट्टी में मिल जाते हैं। इनमें बेली, तग्गड़, कदंब, चंपा, स्वर्णचंपा, जूही, चमेली, कनेर आदि प्रमुख हैं। बैसाख के महीने में यहां के ग्रामीण इसरगत नामक फूल वाले पौधे की लकड़ी ताबीज की तरह प्रयोग करते हैं, ताकि सर्पदंश से बचा जा सके। अररिया कालेज में वनस्पति विज्ञान के विभागाध्यक्ष प्रो. अशोक कुमार के अनुसार गांवों के लोग पूजा व सजावट के अलावा कई प्रकार की बीमारियों में भी इनका प्रयोग करते हैं। उन्होंने बताया कि इन फूलों के बारे में छिटपुट तरीके से काम हुआ है। इनका वैज्ञानिकतरीके से विस्तृत अध्ययन आवश्यक है। प्रो. कुमार ने बताया कि फूलों की मदद से ही इन दिनों कई दवा कंपनियां औषधि निर्माण कर उन्हें मार्केट में उतारती हैं। वहीं, शादी विवाह व अन्य आयोजनों में भी फूलों की मांग होती है। इस दृष्टि से अररिया जैसे इलाके में फ्लोरीकल्चर की भी पर्याप्त संभावनाएं हैं।
इधर, जिला कृषि पदाधिकारी नईम अशरफ ने बताया कि सरकार इन दिनों फूल व औषधीय पौधों की खेती के लिए खूब प्रोत्साहन दे रही है। किसानों को इस दिशा में आगे आना चाहिये।
बाक्स के लिए
रानी, महलानी व टहलानी ..
अररिया, जाप्र: शीर्षक ने शायद आपको थोड़ा चौंका दिया होगा कि फूलों में रानी और नौकरानी कहां से आ गयी। लेकिन यह कहानी इस धरती पर आम जन के फूलों से जुड़ाव की दास्तान है।
कोसी की घाटी में बसे इस क्षेत्र की अपेक्षाकृत उसर जमीन पर शुरूआती गर्मी के दिनों में एक प्लांट उत्पन्न होता है। इस पौधे में सुर्ख रंग के फूल खिलते हैं। इन फूलों में एक खास गुण है कि ये अपने पास आने वाले कीड़ों को खा डालते हैं। फूलों के बीच तीन पराग होते हैं जिन्हें उनकी ऊंचाई व सुंदरता के हिसाब से रानी, महलानी व टहलानी (नौकरानी) कहा जाता है। दंत कथा यह है कि सदियों पहले एक राजा को अपनी रानी पर संदेह हो गया था। उसने कुपित होकर रानी को शाप दे दिया। उस शाप से रानी व उनकी सहेलियां फूल के रूप में तब्दील हो गयी। वनस्पति शास्त्रियों की मानें तो यह प्लांट बाटनी में वर्णित ड्रोसेरा है। फूलों से जुड़ी ऐसी कई और दंतकथाएं हैं। जरूरत है उन्हें सहेजने की।
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